Shiv Temple – Kaleshwarnath Mandir

One of the prominent religious sites of Chhattisgarh, the ancient Pithampur Shiv Mandir is located in the district of Janjgir-Champa. Reflecting the glorious historical ancestry and religious fervor of the state of Chhattisgarh, Pithampur Shiv Mandir draws several devotees who visit the sacred religious monument to receive divine blessing and eternal happiness.

Situated on the banks of Hasdeo River, Pithampur Shiv Mandir is popularly referred to as the Kaleswarnath temple. Dedicated to Lord Shiva who is believed to be the destroyer according the bygone golden era.

Amidst the picturesque landscape of Janjgir–Champa district, the famous religious sanctorum of Pithampur Shiv Mandir stands tall with its over imposing and brilliant structure that display the artistic skills and imaginative creativity of the local craftsmen and architect of the glorious golden period of the ancient times.

An engineering marvel of the ancient period, the beautiful Pithampur Shiv Mandir occupies a prominent position in the religious history of the region. Pithampur Shiv Mandir wears a decorative and attractive look on the special festive occasion of Mahashivratri which is celebrated with much enthusiasm and religious zeal all over the state.

Devotees throng the ancient temple on Mahashivratri to pay their obeisance to the Supreme entity of Lord Shiva. The devotees fervently pray to the Supreme Being by pouring water over the Shiva Linga which is the embodiment of Lord Shiva.Colorful religious fairs are organized on feastive occasion in and around the sacred premises of Pithampur Shiv Mandir.

पौराणिक काल में धर्म वंश के राजा अंगराज के दुराचारी पुत्र राजा बेन प्रजा के उग्र संघर्ष में भागते हुए यहां आये और अंत में मारे गए। चूंकि राजा अंगराज बहुत ही सहिष्णु, दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति के थे अत: उनके पवित्र वंश की रक्षा करने के लिए उनके दुराचारी पुत्र राजा बेन के मृत शरीर की ऋषि-मुनियों ने इसी स्थान पर मंथन किया। पहले उसकी जांघ से कुरूप बौने पुरूष का जन्म हुआ। बाद में भुजाओं के मंथन से नर-नारी का एक जोड़ा निकला जिन्हें पृथु और अर्चि नाम दिया गया। ऋषि-मुनियों ने पृथु और अर्चि को पति-पत्नी के रूप में मान्यता देकर विदा किया। इधर बौने कुरूप पुरूष महादेव की तपस्या करने लगा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग की स्थापना और पूजा-अर्चना का विधान बताकर अंतर्ध्यान हो गये। बौने कुरूप पुरूष ने जिस कालेश्वर पार्थिव लिग की स्थापना कर पूजा-अर्चना करके मुक्ति पायी थी वह काल के गर्त में समाकर अदृश्य हो गया था। वही कालान्तर में हीरासाय तेली को दर्शन देकर उन्हें

न केवल पेट रोग से मुक्त किया बल्कि उसके वंशबेल को भी बढ़ाया। वंश वृध्दि होने पर उन्होंने पीथमपुर में एक मंदिर का निर्माण कराया लेकिन मंदिर में मूर्ति की स्थापना के पूर्व 36 वर्ष की अल्पायु में सन् 1912 में उनका स्वर्गवास हो गया। बाद में मंदिर ट्रस्ट द्वारा उस मंदिर में गौरी (पार्वती) जी की मूर्ति स्थापित करायी गयी